Teachers day पर तीन प्रेरणादायक कहानियाँ

 डॉ  सर्वपल्ली राधाकृष्णन विश्व को एक विद्यालय मानते थे.टीचर डे उनके जन्मदिन पर मनाया जाता है .

                            


1: मार्गदर्शन 

एक बार एक संत जी थे. वह अपने शांत स्वभाव के लिए बहुत प्रसिद्ध थे .उन्हें कभी क्रोध नहीं आता था .उनका एक शिष्य बहुत ही क्रोधी स्वभाव का था .जरा सी बात पर दूसरों से गाली गलौज करना शुरू कर देता.

उसे कई बार अपने गुरु के शांत स्वभाव पर भी बड़ी हैरानी होती कि ,कोई इतना शांत कैसे रह सकता है ?लेकिन संकोच के कारण गुरु से पूछ नहीं पाता .लेकिन सच्चा गुरु तो भाप लेता है कि हमारे मन में क्या चल रहा है ? इसी तरह उसके गुरु ने भी जान लिया कि उसके मन में एक प्रश्न चल रहा है.

गुरु ने उससे पूछ लिया कि अगर तुम मुझ से कुछ पूछना चाहते हो तो बेझिझक पूछ सकते हो. शिष्य ने कहा, "गुरु जी मैं जानना चाहता हूं, कि आपको कभी क्रोध क्यों नहीं आता"? आप इतने शांत कैसे रहते हैं? 

संत कहते हैं कि तुम संध्या के समय मेरे पास आना. मैं तुम्हारे प्रश्न का उत्तर दे दूंगा और तुम्हारे भविष्य के बारे में भी तुम्हें कुछ बताऊंगा. संध्या के समय शिष्य  गुरु के पास पहुंचा . गुरु जी ने कहा कि मैं तुम्हें पहले तुम्हारे भविष्य के बारे में बताऊंगा . 

उसके गुरु ने कहा कि, "तुम्हारे पास जीवन के केवल 7 दिन शेष बचे हैं ".इसलिए तुम पहले जाकर अपने वह कार्य कर लो जो तुम्हें लगता है कि मृत्यु से पहले तुम्हें कर लेनी चाहिए . उसके 6 दिन के बाद आना, तब मैं तुम्हारे प्रश्न का उत्तर दे दूंगा .

शिष्य  ने गुरु को प्रणाम कर विदा ली. छ: दिन के बाद वह फिर से संत के पास आया तो संत ने पूछा तो बताओ इन 6 दिनों में तुमने कितना क्रोध किया, कितने लोगों को के साथ गाली गलौज किया.

 शिष्य ने गुरु से कहा कि, "मुझे लगा कि अब मेरे जीवन के 7 दिन ही शेष बचे हैं, इसलिए मैंने सबके साथ नम्र स्वभाव से बात की".  गुस्सा आने पर भी धैर्य को बनाए रखा कि कुछ दिनों में मेरी मृत्यु आने वाली है . मृत्यु से पहले किसी से वैर क्यों रखना? 

उल्टा मैंने तो जिन लोगों से पहले बुरा बर्ताव किया था उनसे जाकर क्षमा मांगी .कुछ लोगों ने माफ कर दिया और कुछ नहीं माफ नहीं किया. इस बात की मुझे ग्लानी है .

 गुरु मुस्कुराए और बोले कि, "मेरे  शांत स्वभाव  और गुस्सा ना करने का कारण भी यही है, मैं हर दिन को अपने जीवन का अंतिम दिन समझ कर ही ईश्वर की अराधना करता हूं,और किसी के साथ वैर विरोध नहीं करता हूँ" .

मैंने तुम से झूठ  बोला था कि तुम्हारे जीवन के सात दिन शेष बचे हैं, लेकिन जब तुमने इस बात का एहसास किया कि तुम्हारी मृत्यु होने वाली है तब तुमे लगा कि इस जीवन में शुभ कर्म करने चाहिए किसी से लडाई- झगड़ा नहीं करना चाहिए. 

उस दिन से उस शिष्य का जीवन बिल्कुल बदल गया  . उसका क्रोधी स्वभाव शांत हो गया .इसीलिए तो कहते हैं कि जीवन में सद्गुरु मिल जाए तो वह  हमारे अवगुणों को दूर कर देते हैं . 

2: गुरु सब जानते हैं

एक बार कॉलेज में चार दोस्त थे .बहुत शरारती ,पढ़ाई -लिखाई में कम  ध्यान रखते थे .कॉलेज के मासिक पेपर हुए तो उनके मन में विचार आया, अगर आज का पेपर हमारा कल के लिए टल जाए .हम एक दिन में पढ़ लेंगे और अच्छे मार्क्स ले आएंगे ,इसलिए उन्होंने एक युक्ति लगाई .कॉलेज देर से पहुंचे .प्रिंसिपल सर से कहने लगे हमारी गाड़ी का टायर पंचर हो गया था.इसलिए हम देर से आए हैं.कृपया करके हमें एक दिन का टाइम और दे दो .

                                  

सर ने कहा ठीक है, कुछ नहीं बोले. अगले दिन पेपर हुआ तो प्रिंसिपल सर ने चारों को अलग-अलग कमरे में बैठा दिया .सिर्फ उसमें दो ही सवाल थे आपका नाम क्या है और गाड़ी का कौन सा टायर पंचर हुआ था .कमाल की बात चारों ने अलग-अलग टायरों के नाम लिखें. प्रिंसिपल सर ने कहा मैं तो कल ही समझ गया था कि तुम चारों झूठ बोल रहे हो लेकिन मैं कुछ बोला कुछ नहीं .इसीलिए तो कहते हैं कि, "जो गुरु होता है वह सब जानता है."

3: गुरु मिले तो बंधन छूटे

एक बार एक राजा के पास बोलने वाला तोता था .एक पंडित महीने में दो बार राजा के पास कथा सुनाने आता था.पंडित को आदत थी कहने की "हरि मिले तो बंधन छूटे". जब भी पंडित जी ऐसा कहते तो तोता उन्हें झूठा कहता था.                         


 पंडित जी जब भी आते तोता हर बार ऐसा ही कहता .पंडित जी को राजा के सामने बहुत असहज महसूस होता था . पंडित जी ने यह बात अपने गुरु को बताई .गुरुजी ने कहा कि तुम मुझे उस तोते के पास ले जाओ . 

पंडित अपने गुरु को तोते के पास ले गए .गुरुजी ने तोते से पूछा तुम ऐसा क्यों कहते हो.तोते ने बोला कि मैंने एक बार बोल क्या  दिया ,'हरि मिले तो बंधन छूटे 'मेरा तो बंधन छूटने को नहीं आ रहा .

मैं एक बार उड़ता हुआ एक पेड़ पर बैठा था.उसके पास ही साधुओं का आश्रम था . वहा पर एक साधु ने बोला 'हरि मिले तो बंधन छूटे' ,मेरा स्वभाव है बोलने का,मैंने भी ऐसा ही बोल दिया .यह सुनकर उस साधु के सेवकों ने देखा कि यह हरि नाम बोलने तोता है.मुझे पकड़ कर लोहे के पिंजरे में बंद कर दिया. 

उसके बाद एक व्यापारी आश्रम में आया.उसने देखा भी देखा बोलने वाला तोता तो मुझे आश्रम से अपने साथ ले आया और मुझे चांदी के पिंजरे में बंद कर दिया .एक दिन राजा के महल में भोज था .उसमें उस व्यापारी को भी बुलाया गया था.उस ने मुझे राजा को भेंट कर दिया.

रानी को मेरा बोलना इतना पसंद आया उसने मुझे सोने के पिंजरे में बंद कर दिया.मेरे पिंजरे बदलते रहे लेकिन मेरा बंधन छुटने को नहीं आ रहा.इसीलिए मैं पंडित को झूठा कहता हू.

 गुरु जी तोते के कान में कुछ कहते हैं और चले जाते हैं .अगले दिन तोता निष्प्राण सा पिंजरे में पड़ा मिलता है .एक सेवक राजा को बताने जाता है ,राजा जी तोता  निष्प्राण पिंजरे में पड़ा है, हिल डुल नहीं रहा .पीछे से दूसरे सेवक ने सोचा लगता है कि मर गया  क्यों ना इसे पिंजरे में से निकाल दूं.

उसने जैसे ही सेवक ने पिंजरे का दरवाजा खोला तो वह तो तोता फुर्र से गया और साथ में कहने लगा "गुरु मिले तो बंधन छूटे " ," गुरु मिले तो बंधन छूटे. "

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