AHANKAR PER KAHANI
अहंकार पर प्रेरणादायक कहानी
अहंकार किसी भी कार्य का हो सकता है ज्यादा दान पुण्य करने का, ज्यादा धन सम्पत्ति का , किसी कार्य में दक्ष होने का, उच्च कुल का और अधिक शिक्षित होने का।
अहंकारी व्यक्ति को अपने अवगुण नहीं दिखते और दूसरों की अच्छाई नहीं दिख पाती। अहंकार व्यक्ति को एहसास ही नहीं होने देता कि वह ग़लत है।
हिरण्यकश्यप , रावण और कंस सबके पतन का कारण उनका अहंकार ही था। सभी असीम शक्तियां प्राप्त कर स्वयं को ईश्वर ही समझ बैठे थे।
राजा बलि को दान का अहंकार
अधिक दान पुण्य करने पर राजा बलि को अहंकार हो गया था कि मैं तीनों लोकों का स्वामी हूं मुझ से बड़ा कोई दानवीर नहीं हो सकता। भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर दो पग में पूरी पृथ्वी माप कर राजा बलि के अहंकार को चूर - चूर किया था।
जब वामन भगवान ने राजा बलि की दानवीरता के बारे में पता चला तो वह राजा बलि के पास पहुंचे . राजा बलि ने उनका उचित आदर सम्मान किया। वामन भगवान कहने लगे कि राजन् मैंने आपकी दानवीरता के बारे में बहुत सुना है कि आप हर याचक की इच्छा पूर्ण करते हैं। राजा बलि कहने लगे कि, "ब्राह्मण देव आप आदेश करे कि आप को क्या चाहिए? मेरे अधिकार में तीनों लोक है" ।
वामन भगवान बलि से कहने लगे कि मुझे केवल तीन पग के बराबर भूमि चाहिए । चाहे आप तीनो लोकों के स्वामी है ,"मैं आपसे और कुछ नहीं चाहता "।
राजा बलि आश्चर्य चकित हो गए कि मैं तीन लोकों का स्वामी हूं फिर भी तुम्हें मुझ से तीन पग पृथ्वी चाहिए। वामन भगवान कहने लगे कि हां राजन! मुझे तीन पग भूमि ही दान में चाहिए।
राजा बलि ने हाथ में जल लेकर संकल्प लेकर कहा कि," ब्राह्मण देव आप तीन पग पृथ्वी नाप ले। इतना सुनते ही वामन भगवान ने अपना विराट रूप बनाया और तीनों लोकों को दो पग माप लिया" ।
वामन भगवान कहने लगे कि तुमने मुझसे छल लिया है । तुमने मुझसे जो संकल्प लिया था, वह पूरा नहीं किया । अब राजा बलि का तीनों लोकों के स्वामी होने का अहंकार चूर - चूर हो गया था। फिर राजा बलि अहंकार त्याग कर कहने लगे कि," प्रभु आप तीसरा पग मेरे सिर रख लें"।
अहंकार से दूर रहने का प्रसंग
एक बार एक राज्य के राजा का कोई पुत्र नहीं था। राजा वृद्ध हो गया था अब राजा को चिंता होने लगी कि मेरे पश्चात राजगद्दी कौन संभालेगा । राजा की एक पुत्री थी राजा को उसके विवाह की भी चिंता थी।
राजा ने एक दिन घोषणा करवा दी कि कल सुबह जो भी पहला व्यक्ति इस नगर की सीमा में प्रवेश करेंगा उसके साथ मेरी पुत्री का विवाह होगा और उसे राज्य का अगला उत्तराधिकारी घोषित कर दिया जाएगा।
अगले दिन सुबह एक नवयुवक दीन हीन अवस्था में नगर में प्रवेश हुआ। सैनिक उसे पकड़ कर राजा के समक्ष उपस्थित हुए। राजा ने उसके साथ अपनी पुत्री का विवाह करवा दिया और उसका राज्याभिषेक कर दिया। वह नवयुवक राजकुमारी से विवाह करके और एक राज्य का राजा बन कर बहुत खुश था।
कुछ ही समय में उसने राज कार्य सीख लिये और वह प्रजा की सेवा मन लगाकर करता था। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश थी। वह लड़का जो अब योग्य राजा बन चुका था, सप्ताह में एक या दो बार महल में एक छोटी सी कोठरी जिस पर बड़ा सा ताला लगा था, वहां जरूर जाता था।
राज्य के सेनापति को उस पर शक हुआ कि राजा ने कोठरी में ऐसा क्या छुपा रखा है जो उस पर इतना बड़ा ताला लगा रखा है। उसने एक दिन हिम्मत करके राजा से पूछ ही लिया कि महाराज उस कोठरी में ऐसा क्या है? जिसे देखने आप सप्ताह में एक या दो बार जरूर जाते हैं।
राजा ने उसे डांटते हुए कहा कि तुमें कोई अधिकार नहीं है कि तुम एक राजा से कोई प्रश्न पूछ सको। सेनापति उसका जबाव सुनकर खामोश हो गया लेकिन उसके मन की जिज्ञासा और बढ़ गई।
उसने यह बात रानी को बता दी कि महाराज सप्ताह में एक या दो बार उस कोठरी में समय बिताते हैं। कोई नहीं जानता कि उस कोठरी में उन्होंने क्या संभालकर रखा है। रानी जिद्द करने लगी कि आपको दिखाना ही होगा कि उस कोठरी में आपने क्या संभालकर रखा है?
स्त्री हठ के आगे राजा को झुकना पड़ा। अब सेनापति, रानी और मुख्य दरबारी सब बहुत उत्साहित थे कि देखते हैं कि राजा ने कोठरी में ऐसा क्या छुपाया है? जब सब लोगों ने कोठरी में प्रवेश किया तो वहां मटमैले से, फटे हुए से कपड़े एक खूंटी पर टंगे हुए थे। रानी और सब दरबारी आश्चर्य चकित हो कर राजा की देखने लगे। सेनापति ने पूछ ही लिया कि महाराज आप इन कपड़ों को देखने के लिए कोठरी में क्यों आते थे?
राजा का उत्तर सुनकर सब लोग स्तब्ध रह गये। राजा कहने लगा कि," जब भी मुझे अपने किसी काम के लिए अहंकार होने लगता है तो मैं यहां आ जाता हूं और खुद को कहता हूं कि यह तेरी असली सच्चाई है। राजा बनने से पहले जब तुम इस राज्य में आएं थे तो यह मैले और फटे कपड़े ही तेरी कुल जमा पूंजी थी। ऐसा विचार करते ही मेरा अहंकार चूर हो जाता है"।
अहंकार की त्रुटि
एक बार एक मूर्तिकार था बहुत ही जीवंत मुर्तियां बनाता था । उसकी प्रसिद्धि दूर दूर तक फैली हुई थी। एक दिन उसे सपने में दिखा कि यमदूत उसे इस दिन लेने आने वाले हैं।
उसने मृत्यु से बचने हेतु एक योजना बनाई। उसने हूबहू अपने जैसी दिखने वाली दस मूर्तियां बनाई और आप भी उनके बीच में खड़ा हो गया। जब यमदूत उसे लेने आया तो हुबहू दिखने वाली वहां ग्याहरा मुर्तियां थी जिन्हें देखकर यमदूत भी आश्चर्यचकित हो गया कि इन में से असली मूर्तिकार कौन है जिसे उसे लेकर जाना है। मूर्तियो को तोड़ना भी उसे उचित नहीं लगा क्योंकि इस से एक कलाकार की कला का अपमान होता।
यमदूत को एक उपाय सूझा वह मनुष्यों के अहंकार के स्वभाव से परिचित था। उसने कहना शुरू किया कि मूर्तियां तो बेशक बहुत सुंदर है परन्तु मूर्तिकार से मूर्तियां बनाते समय एक त्रुटि रह गई है। मूर्तिकार का अहंकार जाग गया कि मेरी बनाई गई मूर्ति में त्रुटि हो ही नहीं सकती । मैंने पूरा जीवन इन को बनाने में समर्पित किया है। वह तुरंत खड़ा हो गया कि बताओ मेरी बनाई मूर्तियों में क्या त्रुटि है?
यमदूत ने उसे पकड़ लिया और कहने लगा कि तुम्हारी बनाई मूर्तियों में तो कोई त्रुटी नहीं है लेकिन क्या तुम नहीं जानते? बेजान मूर्तियां बोला नहीं करती।
हां लेकिन तुम्हारे स्वभाव में अहंकार की त्रुटि है जिस कारण तुम चुप नहीं रह पाये और अहंकार वश तुम बोल पड़े कि कोई मेरी बनाई मूर्ति में दोष कैसे निकाल सकता है।
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